संवेगात्मक बुद्धि के विकास हेतू क्या किया जाए?
4. दूसरों के संवेगों और उनकी भावनाओं को समझने के लिए यह आवश्यक होता है कि उनकी बात को धैर्यपूर्वक सुना और समझा जाए। अनुसंधानों के द्वारा यह पाया गया है कि जिन व्यक्तियों में संवेगात्मक बुद्धि की अधिकता होती है वे सामान्य रूप से दूसरों की बात अधिक अच्छी तरह से सुनते हुए पाए जाते है।
5. हम भावनाओं में बहकर ठीक तरह नहीं सोच पाते हैं, इस गलत धारणा को मन से निकाल देना चाहिए। संवेगों को अपनी विचार प्रक्रिया से समन्वित करने के प्रयास किए जाने चाहिए। मस्तिष्क और हृदय दोनों का ही ताल मेल उचित व्यवहार प्रक्रिया में सदैव ही सहयोगी सिद्ध होता है संवेगों का अनुचित दमन करना कभी भी लाभदायक सिद्ध नहीं होता बल्कि मानसिक शक्तियों के उचित उपयोग से उन पर वांछित लगाम लगाने में ही व्यक्तिगत और सामाजिक कल्याण निहित होता है।
6. संवेग चाहे नकारात्मक हो या सकारात्मक, वे व्यक्ति विशेष के लिए परिस्थिति विशेष अनुसार लाभकारी सिद्ध होते हैं। क्योंकि उनका प्रादुर्भाव व्यक्ति के मस्तिष्क, हृदय और इन्द्रियों को उसकी व्यवहार क्रियाओं के माध्यम से जोङता है। क्रोध, मद, घृणा और अवसाद जिन्हें हम गलत संवेग समझते हैं वे भी समय और परिस्थिति अनुसार उतने ही आवश्यक और हितकारी होते हैं जितने कि साहस, प्रेम, शांति और हमें अपने संवेगों को उचित समय पर उचित मात्रा में उचित रूप से अभिव्यक्त करने का ढंग आता हो।
महान् ग्रीक दार्शनिक अरस्तु के शब्दों में ’’कोई भी व्यक्ति क्रोध कर सकता है यह बहुत आसान है परन्तु सही व्यक्ति के साथ सही मात्रा में सही समय पर सही प्रयोजन हेतु सही ढंग से क्रोध करना आसान नहीं है।
7. बालकों को प्रारम्भ से ही अपनी भावनाओं तथा संवेगों के ऊपर उचित नियन्त्रण रखने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। नकारात्मक संवेग जैसे भय, पीङा, क्रोध, घृणा आदि के बारे में तो इस ओर और भी अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
8. कभी भी अपनी भावनाओं तथा संवेगों को अपनी प्रगति की राह का ऐसा रोङा नहीं बनने देना चाहिए। सभी तरह से उन्हें अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए एक अच्छे अभिप्रेरक के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
ध्यान रखें !
9. सभी प्रकार से ऐसा प्रशिक्षण देने का प्रयत्न करना चाहिए कि बालक केवल अपनी भावनाओं तथा संवेगों के बारे में ही नही सोचते रहे बल्कि वह यह जानने का प्रयास करें कि दूसरों की किसी विचार या वस्तु विशेष के प्रति किसी समय विशेष पर क्या भावनायें तथा प्रतिक्रियाएँ हैं। दूसरों की भावनाओं की सही अनुभूति ही उन्हें दूसरों के नजदीक ला सकती है।
10. बालकों में दूसरों के साथ वैचारिक आदान-प्रदान करने और आपसी सम्बन्ध बनाने हेतु उचित सामाजिक कोशलों का विकास किया जाना चाहिए। सम्बन्धों को बनाये रखने के लिए इस बात का सदैव ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी परिस्थति में बोलचात समाप्त न हो, दूसरों को अपनी बात कहने या अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाये तथा जहाँ तक हो सके सम्बन्धों में आई रिक्तता तथा कटुता को बहुत अधिक बढ़ने का अवसर न दिया जाये।
11. संवेगात्मक बुद्धि के विकास हेतु इस बात का ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि जितना ध्यान संज्ञानात्मक कौशलों तथा मानसिक विकास पर दिया जाता है उतना ही ध्यान भावात्मक क्षेत्र की योग्यताओं तथा कौशलों के विकास पर भी दिया जाए।
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