संवेगात्मक बुद्धि का विकास हेतु क्या किया जाए?
उत्तर:–अपने स्वयं में और दूसरों में संवेगों के भली-भाँति प्रत्यक्षीकरण हेतु उचित योग्यताओं और क्षमताओं के विकास का प्रयास किया जाए।
2. दूसरों के बारे में जो भी गलत भावनाएँ उमङे और संवेगों के गलत प्रत्यक्षीकरण करने सम्बन्धी गलत परिणाम सामने आएं, उन पर रोक लगाने के उपाय किए जाएं। दूसरे की भावनाओं और संवेगों को गलत ढंग से लेना, सम्बन्धों को बिगाङने की दिशा में काफी घातक सिद्ध हो सकता है क्योंकि जब हम अपने ढंग से उनकी भावनाओं और संवेगों को देखते है तो इसमें पक्षपात और द्वेषपूर्ण दृष्टिकोण ही हावी रहता है। हमेशा यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रेम और आपसी विश्वास ही सम्बन्धों में नजदीकी लाता है जबकि घृणा और बैर रखने से सम्बन्धों में सदैव कटुता ही आती है।
3. सभी परिस्थितियों में यह समझा जाना चाहिए कि जिस प्रकार के संवेगों की अनुभूति हमें हो रही हो दूसरों को भी हो रही है उनके बारे में सही ज्ञान और चेतना हमारे अन्दर विकसित हो। सभी तरह से यह प्रयत्न होना चाहिए कि बालकों को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाए कि वे जो कुछ भी, जिस परिस्थिति में अपने और दूसरों के संवेगों के सन्दर्भ में अनुभव करें, उस समय उन्हें उनका पूर्ण और सही आभास होना चाहिए।
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